(1) मरीचि के पुत्र कश्यप प्रजापति थे। ब्रह्मदेव की दाहिनी हाथ की बोटे की नली से दक्ष नाम का पुरुष और बाएँ हाथ की बोटे की नली से धरनी नाम की स्त्री जन्मीं। उन दोनों से एक हज़ार-हज़ार महा ऋषि जन्मे। (2) ब्रह्मा के मानस पुत्रों में दूसरे स्थान पर रहने वाले अंगिरस्‍ु को उद्दध्य, बृहस्पति और संवर्त जैसे पुत्र हुए। बृहस्पति देवताओं के आचार्य बने। (3) मैत्रि (अत्रि) नामक मानस पुत्र से अनेक महा मुनि जन्मे। (4) पुलस्त्य नामक ब्रह्मा के मानस पुत्र से राक्षसों का जन्म हुआ। (5) पुलह नामक मानस पुत्र से किन्नर और किमपुरुष वर्ग उत्पन्न हुए। (6) क्रतू नामक मानस पुत्र से पक्षियों की जाति उत्पन्न हुई।

   
    

शान्तिपर्व (Mahabharat) - 12. शान्तिपर्व(महाभारत)


॥ श्रीः ॥
12.127. अध्यायः 127
Mahabharata - Shanti Parva - Chapter Topics
वदरिकाश्रमं गतस्य ऋषभस्य तनुनामकेन महर्षिणा सह संवादः॥ 1॥ वने नष्टपुत्रान्वेषणवशात्तत्रोपागतेन वा द्युम्नेन राज्ञा तनुंप्रति आशाया ज्यायः किमिति प्रश्नः॥ 2॥


Mahabharata - Shanti Parva - Chapter Text

भीष्म उवाच। 12-127-0x(5693)(69818)
ततस्तेषां समेतानामृषीणामृषिसत्तमः।
ऋषभो नाम विप्रर्षिर्विस्मयन्निदमब्रवीत्॥ 12-127-1(69819)
पुराऽहं राजशार्दूल तीर्थान्यनुचरन्प्रभो।
समासादितवान्दिव्यं नरनारायणाश्रमम्॥ 12-127-2(69820)
यत्र सा बदरी रम्या सरो वैहायसं तथा।
यत्र चाश्वशिरा राजन्वेदान्पठति शाश्वतान्॥ 12-127-3(69821)
तस्मिन्सरसि कृत्वाऽहं विधिवत्तर्पणं पुरा।
पितृणां देवतानां च ततोश्रममियां तदा॥ 12-127-4(69822)
रमाते यत्र तौ नित्यं नरनारायणावृषी।
अदूरादाश्रमात्किंचिद्वासार्थमगमं तदा॥ 12-127-5(69823)
अत्र चीराजिनधरं कृशमुच्चमतीव च।
अद्राक्षमृषिमायान्तं तनुं नाम तपोनिधिम्॥ 12-127-6(69824)
अन्यैर्नरैर्महाबाहो वपुषाऽप्रतिमं तदा।
कृशता चापि राजर्षे न दृष्टा तादृशी मया॥ 12-127-7(69825)
शरीरमपि राजेन्द्र तनु कानिष्ठिकासमम्।
ग्रीवा बाहू तथा पादौ केशाश्चाद्भुतदर्शनाः॥ 12-127-8(69826)
शिरः कायानुरूपं च कर्णौ नेत्रे तथैव च।
तस्य वाक्चैव चेष्टा च सामान्ये राजसत्तम॥ 12-127-9(69827)
दृष्ट्वाऽहं तं कृशं विप्रं भीतः परमदुर्मनाः।
पादौ तस्याभिवाद्याथ स्थितः प्राञ्जलिरग्रतः॥ 12-127-10(69828)
निवेद्य नामगोत्रे च तथा कार्यं नरर्षभ।
प्रदिष्टे चासने तेन शनैरहमुपाविशम्॥ 12-127-11(69829)
ततः स कथयामास धर्मार्थसहिताः कथाः।
ऋषिमध्ये महाराज तत्र धर्मभृतां वरः॥ 12-127-12(69830)
त--स्तु कथयत्येव राजा राजीवलोचनः।
उपयाज्जवनैरश्वैः सबलः सावरोधनः॥ 12-127-13(69831)
स्मरम्पुत्रमरण्ये वै नष्टं परमदुर्मनाः।
भूविद्युम्नपिता श्रीमान्वीरद्युम्नो महायशाः॥ 12-127-14(69832)
इह द्रक्ष्यामि तं पुत्रं द्रक्ष्यामीहेति भारत।
एवमाशाकृशो राजा चरन्वनमिदं पुरा॥ 12-127-15(69833)
दुर्लभः स मया द्रष्टुं भूय एव च धार्मिक।
एकः पुत्रो महारण्ये नष्ट इत्यसकृत्तदा॥ 12-127-16(69834)
न स शक्यो मया द्रष्टुमाशा च महती मम।
तया परीतगात्रोऽहं मुमूर्षुर्नात्र संशयः॥ 12-127-17(69835)
एतच्छ्रुत्वा तु भगवांस्तनुर्मुनिवरोत्तमः।
अवाक्शिरा ध्यानपरो मुहूर्तमिव तस्थिवान्॥ 12-127-18(69836)
तमनुध्यान्तमालक्ष्य राजा परमदुर्मनाः।
उवाच वाक्यं दीनात्मा मन्दमन्दमिवासकृत्॥ 12-127-19(69837)
दुर्लभं किंनु देवर्षे आशायाश्चैव किं महत्।
ब्रवीतु भगवानेतद्यदि गुह्यं न चेत्तदा॥ 12-127-20(69838)
तनुरुवाच। 12-127-21x(5694)
महर्षिर्भगवांस्तेन पूर्वमासीद्विमानितः।
बालिशां बुद्धिमास्थाय मन्दभाग्यतयाऽऽत्मनः।
अर्थयन्कुशलं राजन्काञ्चनं वल्कलानि च॥ 12-127-21(69839)
[अवज्ञापूर्वकेनापि न संपादितवांस्ततः।]
निर्विण्णः स तु विप्रर्षिर्निराशः समपद्यत॥ 12-127-22(69840)
एवमुक्तोऽभिवाद्याथ तमृषिं लोकपूजितम्।
श्रान्तोऽवसीदद्धर्मात्मा यथा त्वं नरसत्तम॥ 12-127-23(69841)
अर्ध्यं ततः समानीय पाद्यं चैव महायशाः।
आरण्येनैव विधिना राज्ञे सर्वं न्यवेदयत्॥ 12-127-24(69842)
ततस्तमृषयः सर्वे परिवार्य नरर्षभम्।
उपाविशन्पुरस्कृत्य सप्तर्षय इव ध्रुवम्॥ 12-127-25(69843)
अपृच्छंश्चैव तत्रैनं राजानमपराजितम्।
प्रयोजनमिदं सर्वमाश्रमस्य प्रवेशने॥ ॥ 12-127-26(69844)

इति श्रीमन्महाभारते शान्तिपर्वणि राजधर्मपर्वणि सप्तविंशत्यधिकशततमोऽध्यायः॥ 127॥

Mahabharata - Shanti Parva - Chapter Footnotes

12-127-3 वैहायसं विहायसा गच्छन्त्या मन्दाकिन्या वैहायस्या इदं वैहायसम्॥ 12-127-4 ततोश्रमं तत आश्रमं मण्डपं इयां गतवामह॥ 12-127-5 रेमाते रजसा यत्रेति थ. द. पाठः॥ 12-127-7 वपुयाऽष्टगुणान्वितमिति झ. पाठः॥ 12-127-21 तेन तव पुत्रेण भूरिद्युम्रेन॥ 12-127-23 एवं मुनिना उक्तः वीरद्युम्नः अवसीदत् नष्टप्रायोऽभूदित्यर्थः॥ 12-127-26 एवं मुनिना राजपूजानन्तरं आगताः किमर्थं आश्रमे त्वं प्रविष्ट ोऽसीत्य पृच्छन्॥


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